Thursday, September 25, 2008
मैथिली लोकगीत
सावन-भादों मे...!
दसे रुपैया मोरा ससुर के कमाई
हो हो, गहना गढ़एब की छाबायेब बंगला
सावन-भादों मे...! ]
पांचे रुपैया मोरा भैन्सुर के कमाई
हो हो, चुनरी रंगायब की छाबायेब बंगला
सावन-भादों मे...!
दुइये रुपैया मोरा देवर के कमाई
हो हो, चोलिया सियायेब की छाबायेब बंगला
सावन-भादों मे...!
एके रुपैया मोरा ननादोई के कमाई
हो हो, टिकुली मंगायेब की छाबायेब बंगला
सावन-भादों मे...!
एके अठन्नी मोरा पिया के कमाई
हो हो, खिलिया मंगाएब की छाबायेब बंगला
सावन-भादों मे...!
Tuesday, September 23, 2008
वेलकम टू सज्जनपुर- जरुर देखू

रिपोर्टिंग में फिल्म बीट भयला सँ हमारा हर तरह के फिल्म देखअ पड़इया। एहि सूची में नीक आ खराब दूनों तरह के फिल्म होइत अछि। मुदा, एहि सप्ताहक फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर बहुत दिन के बाद हमरा एकटा नींक फिल्म लागल। ओना फिल्मके निर्देशक श्याम बेनेगल अपन फिल्ममें गंभीरता के लेले प्रसिद्ध छैथ। लेकिन एहि बेर ओ व्यंग्य आ हास्य के सहारा लेने छैथ। मुदा फिल्म देखब त जानब की एहि फिल्म में अपान सबहक लोकतंत्र के बारे में एकटा प्रासंगित स्टेटमेंट अछि।
फिल्म में श्रेयस तलपदे महादेव कुशवाहा के रोल कैने छैथ। सज्जनपुर में एकटा वैह मात्र लोक छिथिन्ह जे पइढ़-लिख सकैत छैथ। हुनकर नायिका बनल छथिन्ह अमृता राव आ हुनाक गामक लड़की बनअ में कोनों विशेष मेहनत करअकै ज़रुरत नहिं पड़लैन। महादेव गामक लोकनि के चिट्ठी पत्री लिखैत छथि। एहि दौरान सरपंची के चुनाव हौई छै, आ एहि बहाने निर्दशक गाम राजनीति के पर्दाफास करैत छथि।
अंधविश्वास के मारल एकटा पीसी( इला अरुण) अपन मांगलिक बेटी के विवाह कुक्कुर सँ करेवाक प्रसंग आहां के हंसेबो करत आ सोचइपर मजबूर करत। इला अरुण के स्वाभाविक अभिनय देखकअ मन होइ त अछइ जे अपन तथाकथित भोजपुरी सुपरस्टार नायिका आ नायक लोकनि के कहियैन कि देखियउ ओ इला जी के अभिनय देखू आ कछु सीख लियअ। भोजुरी सँ याद आएल फिल्म में रविकिशन मेहमान एकटा रोल में छैथ आ नींक अभिनय केने छैथ।
संगीत पक्ष कनि कमोजोर जरुर छै लेकिन लोकेशन आ पटकथा में कोनो कमजोरी नईं दिखाई पड़ल। हमरा तरफ सँ फिल्म के पांच में सँ चारि अंक। इ फिल्म जरुर देखू..।
Monday, September 22, 2008
ऑस्करक दौड़ में भारतीय फिल्म
खबर इ अछि जे एहि साल आमिर ख़ानक फ़िल्म 'तारे ज़मीं पर' ऑस्करक दौड़ में आवि गेल अछि। भारतसँ विदेशी भाषाक श्रेष्ठ फ़िल्मक श्रेणी में इहि फिल्मके प्रवेश भेटतई। शनिवारक सांझमें मुंबईमें फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ़ सँ फ़िल्म निर्माता सुनील दर्शन एहि बातक घोषणा केलखिन्ह। एहि ठाऊं आहांसब के बता दियअ कि एखनि धरि विदेशी फिल्मक श्रेणी में कै टा भारतीय फिल्म नामित भेल अछि। जेहि सालक उल्लेख कअ रहल छी, जेहिके अलगा वसंतमें पुरस्कार देल जाइत अछि।
१८५६- मदर इंडिया - महबूब खान- नॉमिनेटेड
१९६२- साहब, बीवी और गुलाम- अबरार अलवी
१८६९- देवामागन्- ए सी थिरुलोगचंदर
१९७०-कोई एंट्री नहीं
१९७१- रेशमा और शेरा- सुनील दत्त
१९७२ उपहार- सुधेंदु रॉय
१९७३- सौदागर-सुधेंदु ऱॉय
१८७४- गरम हवा- एम एस सथ्यू
१९७५-७६ कोई एंट्री नहीं
१९७७-मंथन- श्याम बेनेगल
१९७८ द चेस प्लेयर- सत्यजित् रे
१९७९- कोई एंट्री नहीं
१९८०- पायल की झनकार- सत्येन बोस
१९८१-८३- कोई एंट्री नहीं
१९८४- सारांश- महेश भट्ट
१९८५- सागर- रमेश सिप्पी
१९८६- स्वाति मुत्यम्- विश्वनाथ
१९८७- नायकन्- मणिरत्नम्
१९८८-सलाम बॉम्बे- मीरा नायर- नॉमिनेटेड
१८८९- परिंदा- विधु विनोद चोपड़ा
१९९०- अंजलि- मणिरत्नम्
१९९१- हिना- रणधीर कपूर
१९९२-थेवर मगन- भरतन्
१९९३- रुदाली- कल्पना लाजिमी
१९९४ बैंडिट क्वीन- शेखर कपूर-
१९९५- कुरुदिपुनल्- पी सी श्रीराम
१९९६-इंडियन- शंकर
१९९७- गुरु- राजीव अंचल
१९९८-जींस- शंकर
१९९९- अर्थ- दीपा मेहता
२०००- हे राम- कमल हासन
२००१- लगान- आशुतोष गोवारिकर- ऩॉमिनेटेड
२००२-देवदास- संजय लीला भंसाली
२००३-कोई एंट्री नहीं
२००४- श्वास- संजय सावंत
२००५-पहेली- अमोल पालेकर
२००६- रंग दे बसंती- राकेश ओमप्रकाश मेहरा
२००७- एकलव्य- द रॉयल गार्ड- विधु विनोद चोपड़ा
२००८- तारे ज़मीन पर- आमिर खान
एहि बातक मतलब इ भेलई कि एखनि धरि तारे ज़मीर पर के छोडि दी त मात्र तीन फिल्म ऑस्करक दौड़ में आवि सकल अछइ, मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे आ लगान।
Wednesday, September 17, 2008
निवेदन
आहां सबहक
मंजीत ठाकुर
बेटा सबहक पर्व- जितिया
एहि त्योहार पर जे हम सोचि रहल छी आ जे हमरा याद आवि रहल अछि ऊ कनिक अलग अछि। सोइच ई रहल छी कि जितिया त्योहारक पीछे इतिहास की भ सकैत अछि? हमरा लगैत अछि कि सौ-दो सौ बरस या ओकरो सँ पहिनै जहन मृत्युदर बेहद ज्यादा छल, अकाल, बाढ और महामारी बैशी छल...लडाईयो होइते रहल छल। ऐना में लोक सबहक औसत उम्र कम होइत छल। ३५- या ज्यादा-ज्यादा ४०। ऐना में पंडित लोकनि घबरैल मां के इ त्योहार सुझैने हेथिन्ह।
बाप बेटा के लेल इ उपवास कियै नहिं करैत छैथ ई एकटा अलग आ मह्तवपूर्ण प्रन अछि। संभवतः कमाऊ इंसान के लेल विशेष उपवास आदि केनाइ ठीक नै होइत होई।
दोसर बात जे हमरा जितिया सँ याद आवि रहल अछि.. कि परिवार में सबसँ छोट हेबाक फायदा हमरा हमेशा भेटल। हमर बहिन सबके भी कखनो एहि बातक शिकायत नहि रहल कि मां हुनकर लंबा आयु केलेल कोनो व्रत नहि करैतच छथिन्ह।
जितिया उपवास शुरु होवा सं पहिले मां हमरा भोरे उठा दैत छलखिन्ह। बहिन सब जबरिया मुंह धुलवाक थारी में चिउडा-दही परोस देइत छैलखिन्ह। मैथिली में एहि प्रक्रिया को ओँठगन कहैत जाइत अछि।
संभव अछि कि मां अकेले खा लेबाक बात नींक नहिं जानैत होइथि। लेकिन इ काज एहि त्योहारक अभिन्न अंग भ गेल अछि, कि मां भोरे-भोर लिंग विभेद बिना सब बच्चा-बुच्ची के उत्कृष्ट खाना खुआ दैत चैलथिन्ह। तँ बुझियऊ कि हमहुं बिना कोनो हील-हुज्जत के सबटा चूडा-दही सरपोइट क- बिना कथु बजनें पुनः लंबी तान दैत छलहुं। भरल पेट.. नींद खुलैत-खुलैत ९ या दस बजबाके छल। भोरे-भोर एहि भोजनभट्टगिरी करअ में जे मजा छल, से आइयो याद आवि रहल अछि।
मन कअ रहल अछि जे जितिया सँ पहिने मां लअग गाम पर जाऊ, मुदा बॉस छुट्टी देवअ सँ मना कअ रहल अछि।